| ATTACK ON CORRUPTION ASSOCIATION ने उच्च अधिकारियों को भेजा गया शिकायत पत्र, तत्कालीन पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग उठाई है |

गाजियाबाद। निवाड़ी थाना क्षेत्र से जुड़े शिवकुमार त्यागी प्रकरण में निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच की मांग जोर पकड़ने लगी है। सामाजिक संगठन ATTACK ON CORRUPTION ASSOCIATION ने मामले को लेकर प्रदेश के उच्च अधिकारियों एवं विभिन्न संस्थाओं को सामूहिक ई-मेल के माध्यम से शिकायत एवं प्रतिवेदन भेजकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार दिवंगत शिवकुमार त्यागी पुत्र ककरना सिंह, निवासी निवाड़ी, तहसील मोदीनगर, जनपद गाजियाबाद को मार्च 2014 में थाना निवाड़ी में दर्ज मुकदमा संख्या 34/2014, धारा 302 के मामले में अभियुक्त बनाया गया था। इस प्रकरण में फरवरी 2026 में माननीय न्यायालय द्वारा निर्णय पारित किया गया, जिसमें अभियुक्तगण को दोषमुक्त किया गया।
संगठन का कहना है कि न्यायालय के निर्णय में अभियोजन पक्ष के मामले और विवेचना से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों पर विचार किया गया। इसी को देखते हुए संगठन ने अगस्त 2026 में पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश, मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश शासन, अपर मुख्य सचिव गृह विभाग, राज्यपाल उत्तर प्रदेश, पुलिस आयुक्त गाजियाबाद, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग को शिकायत भेजकर मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की।
थाना स्तर पर जांच पर उठाए सवाल
संगठन के अनुसार शिकायत के बाद गाजियाबाद प्रशासन द्वारा प्रकरण की जांच कर आख्या प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं और वर्तमान में जांच थाना निवाड़ी को सौंपी गई है। संगठन ने मांग की है कि यदि प्रकरण में तत्कालीन पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं, तो जांच उसी थाना स्तर पर कराने के बजाय किसी स्वतंत्र एवं वरिष्ठ अधिकारी अथवा स्वतंत्र जांच एजेंसी से कराई जानी चाहिए।
पूरी विवेचना की समीक्षा की मांग
ATTACK ON CORRUPTION ASSOCIATION ने मांग की है कि न्यायालय के निर्णय का सम्यक अध्ययन करते हुए तत्कालीन विवेचक और संबंधित पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच की जाए। साथ ही एफआईआर दर्ज होने से लेकर विवेचना, गिरफ्तारी, साक्ष्य संकलन और आरोपपत्र दाखिल करने तक की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा की जाए।
संगठन ने यह भी कहा है कि यदि जांच में किसी अधिकारी द्वारा जानबूझकर गलत तथ्य प्रस्तुत करने, साक्ष्यों की अनदेखी करने, गलत साक्ष्य या दस्तावेज तैयार करने अथवा निर्दोष व्यक्तियों को गलत तरीके से अभियुक्त बनाए जाने की पुष्टि होती है, तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध नियमानुसार विभागीय एवं विधिक कार्रवाई की जानी चाहिए।
संगठन ने स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को पूर्वाग्रहपूर्वक दोषी घोषित करना नहीं है, बल्कि न्यायालय के निर्णय और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर निष्पक्ष जांच, जवाबदेही तथा विधिसम्मत कार्रवाई सुनिश्चित कराना है।
