ओडीओपी और पीएम विश्वकर्मा जैसी सरकारी योजनाओं ने पीतल नगरी के इस शिल्पकार को दी नई उड़ान, अब देश-विदेश में हो रही हुनर की कद्र
कभी मुफलिसी में खुद के तराशे बर्तन बेचने को मजबूर थे चिरंजीलाल, आज बेटे समेत कई शिष्यों को दिला चुके हैं राष्ट्रीय पुरस्कार; अंबानी परिवार से भी मिला बुलावा

मुरादाबाद, 22 जून पीतलनगरी मुरादाबाद स्थित उनका अपना घर, जहां इन दिनों बधाई देने वालों का तांता लगा है और सामने बैठे हैं 76 साल के एक ऐसे शिल्पकार, जिनकी उंगलियों ने पीतल पर न जाने कितनी ही अनकही कहानियां उकेरी हैं। शहर के मशहूर शिल्पकार चिरंजीलाल के लिए कल यानी 23 जून का दिन किसी दीवाली से कम नहीं है। 55 वर्षों की लंबी और कठिन साधना के बाद कल शाम 5 बजे के बाद नई दिल्ली में उन्हें देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों ‘पद्म श्री’ के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा जाएगा।गृह मंत्रालय के निमंत्रण पर कल अपने बेटे खुश सिंह और अन्य परिजनों के साथ दिल्ली में यह सम्मान ग्रहण करने जा रहे चिरंजीलाल जी की आंखें, अपने घर की बैठक में बैठे हुए संघर्ष के दिनों को याद कर छलक उठती हैं। 21 साल की उम्र से पीतल पर मरोड़ी और कलम का बारीक काम करने वाले इस फनकार की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं है, बल्कि ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ओडीओपी) और ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ जैसी सरकारी मुहिमों से मिली संजीवनी की भी एक जीती-जागती मिसाल है।*1980 की वह मुफलिसी जब कौड़ियों के भाव बेचने पड़े अपने ही तराशे बर्तन*चिरंजीलाल जब अपने पुराने दिनों को याद करते हैं, तो उनका गला रुंध जाता है। वे बताते हैं कि साल 1980 का दशक उनके जीवन का सबसे भारी और संघर्षपूर्ण दौर था। उस समय कला की कद्र कम थी और इस बारीक काम की मजदूरी नाम मात्र की मिलती थी। हालात इतने बदतर हो गए थे कि परिवार का पेट पालने के लिए उन्हें अपने ही हाथों से बनाए गए बेशकीमती और बारीक नक्काशी वाले आइटम औने-पौने दामों पर बेचने पड़े थे। कई बार ऐसा लगा कि इस पुश्तैनी काम को छोड़ दें, लेकिन कला के प्रति उनके जुनून ने उन्हें रुकने नहीं दिया। आज करीब 55 साल बाद जब वे पलटकर देखते हैं, तो उन्हें सुकून मिलता है कि उन्होंने उस मुफलिसी में भी अपनी छेनी-हथौड़ी का साथ नहीं छोड़ा।*गुरु की विरासत और शिष्यों की नई फौज ने बढ़ाया मान*चिरंजीलाल की इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे उनके गुरु अमर सिंह जी का बहुत बड़ा हाथ है। अमर सिंह को भी पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका था। अपने गुरु से मिली पीतल पर मरोड़ी और कलम के बारीक काम की इस नायाब कला को चिरंजीलाल ने सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाया। आज उनके बेटे खुश सिंह राज्य और राष्ट्रीय पुरस्कार (नेशनल अवार्ड) से सम्मानित हैं। इसके अलावा उनके शिष्य जितेंद्र कुमार को भी स्टेट अवार्ड मिल चुका है। उनके कई अन्य शागिर्द आज बड़ी-बड़ी एक्सपोर्ट फर्मों में अपनी कला का लोहा मनवा रहे हैं।
*ओडीओपी और विश्वकर्मा योजना से बदली फनकारों की तकदी
*एक वक्त था जब छोटे और गुमनाम शिल्पकारों को कोई नहीं जानता था, लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल गए हैं। चिरंजीलाल बेहद खुशी के साथ बताते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं, विशेषकर ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ओडीओपी), ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ और ‘कौशल विकास योजना’ ने उनके जैसे कारीगरों को एक नई पहचान दी है। जिला उद्योग केंद्र और एमएसएमई विभाग की मदद से अब कारीगरों को देश भर में लगने वाली प्रदर्शनियों में मुफ्त स्टॉल और आने-जाने का खर्च सरकार की तरफ से दिया जा रहा है। टूलकिट और अनुदान जैसी सुविधाओं से शिल्पकार अब सीधा बाजार से जुड़ रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति बेहद मजबूत हुई है।*हुनर ऐसा कि अंबानी परिवार से भी आ गया ऑफर*चिरंजीलाल के बारीक काम की ख्याति अब सिर्फ मुरादाबाद या दिल्ली तक सीमित नहीं है। उनके हुनर की चमक देश के सबसे बड़े घरानों तक पहुंच चुकी है। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि हाल ही में उन्हें अंबानी परिवार (मुकेश-नीता अंबानी के कार्यालय) की ओर से भी संपर्क किया गया है। उनके बेहतरीन काम को देखते हुए उन्हें मुंबई और विदेशों में खुलने वाले बड़े शोरूम्स के लिए विशेष कलाकृतियां तैयार करने का ऑफर मिला है। हालांकि, अपनी सादगी के लिए पहचाने जाने वाले चिरंजीलाल अभी भी अपना काम पूरी शिद्दत और अपने उसी पुराने अंदाज में ही करना पसंद करते हैं।*मशीनों से नहीं, हाथ की मेहनत से मिलती है असली पहचान*आज के दौर में जहां युवा कंप्यूटर और 3डी डिजाइनिंग की ओर भाग रहे हैं, वहीं 76 वर्षीय चिरंजीलाल का मानना है कि उच्च कोटि की कला सिर्फ हाथों की मेहनत से ही जन्म लेती है। उनका कहना है कि आज की पीढ़ी शॉर्टकट ढूंढती है, लेकिन ‘पद्म श्री’ जैसे सर्वोच्च मुकाम तक पहुंचने के लिए तपना पड़ता है। उन्होंने युवाओं से अपील की है कि वे सरकार की ओडीओपी और विश्वकर्मा योजना का लाभ उठाएं, अपना व्यापार शुरू करें, लेकिन अपनी जड़ों और हाथों के हुनर को कभी न भूलें। मशीनें कभी उस अहसास को नहीं उकेर सकतीं जो एक शिल्पकार की उंगलियां पीतल पर उकेरती हैं।
