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Moradabad Prahari

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सिर्फ 9 महीने में संवरा संभल का ऐतिहासिक इतिहास,कारवां सराय गेट का शानदार कायाकल्प, शाहजहां काल की भव्यता वापस

ByMoradabadprahari

Apr 16, 2026

13 जून 2025 से शुरू हुआ एएसआई मेरठ मंडल का संरक्षण कार्य 27 फरवरी 2026 को हुआ पूरा, पर्यटन और विकास को मिलेगी नई रफ्तार

सम्भल ,जिलाधिकारी की पहल से अतिक्रमण हटाकर प्रशस्त हुआ जीर्णोद्धार का मार्ग, जिले के 5 अन्य स्मारकों के संरक्षण की भी तैयारी*संभल, 14 अप्रैल। जिले के सोंधन मुहम्मदपुर स्थित ऐतिहासिक कारवां सराय के प्रवेश द्वार ने एक बार फिर अपना खोया हुआ गौरव हासिल कर लिया है। शाहजहां के काल की मानी जाने वाली इस धरोहर का जीर्णोद्धार कार्य लगभग नौ महीने (13 जून 2025 से 27 फरवरी 2026) के अथक प्रयास के बाद सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) मेरठ मंडल द्वारा 10-06-1933 की अधिसूचना संख्या UP 385 के तहत संरक्षित इस स्थल पर किए गए उत्कृष्ट कार्य में जिलाधिकारी डॉ. राजेंद्र पैंसिया का विशेष और सकारात्मक योगदान रहा।*एएसआई की पारंपरिक तकनीक से संवरी शाहजहां कालीन भव्यता*कारवां सराय का यह प्रवेश द्वार अपने आप में मुगलकालीन वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना है, जिसे शाहजहां के काल का माना जाता है। लंबे समय के प्रभाव के चलते यह जर्जर स्थिति में पहुंच गया था। इसके ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) मेरठ मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद् विनोद सिंह रावत ने अपनी संरक्षण नियमावली के तहत पारंपरिक तकनीकों का बेहतर इस्तेमाल कर इसे नया जीवन दिया है। प्रवेश द्वार में एक केंद्रीय मार्ग और दोनों ओर दो मंजिला पहरेदारों के कमरे हैं, जिन तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां और मेहराबदार प्रवेशिकाएं बनी हैं। जीर्णोद्धार के बाद इन मेहराबों और दीवारों की भव्यता अब सामने आई तस्वीरों में साफ देखी जा सकती है, जहां उगी हुई झाड़ियों और टूटी दीवारों की जगह अब एक सुरक्षित और संरक्षित ढांचा खड़ा है, जो इसे संभल के एक प्रमुख आकर्षण के रूप में स्थापित करता है।*जिलाधिकारी के प्रयासों से आसान हुई राह*इस बड़े और ऐतिहासिक प्रोजेक्ट की सफलता में संभल के जिलाधिकारी डॉ. राजेंद्र पैंसिया की भूमिका बेहद अहम रही। किसी भी प्राचीन स्मारक के आसपास समय के साथ कुछ निर्माण हो जाते हैं, जिन्हें व्यवस्थित करना एक बड़ी चुनौती होती है। डीएम ने इस धरोहर के महत्व को समझते हुए व्यक्तिगत रुचि ली और प्रशासन की कुशल कार्यप्रणाली से आसपास के ऐसे निर्माणों को शांतिपूर्ण ढंग से हटवाया। उनके इस सहयोगात्मक कदम और कुशल नेतृत्व की वजह से ही एएसआई की टीम बिना किसी रुकावट के तय समय सीमा (27 फरवरी 2026) के भीतर इस जटिल संरक्षण कार्य को सुगमता से अंजाम दे सकी।*पर्यटन को मिलेगा पंख, स्थानीय लोगों के लिए खुलेंगे विकास के द्वार*ऐतिहासिक स्मारकों का जीर्णोद्धार सिर्फ ईंट और पत्थरों को सहेजना नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देने का एक शानदार अवसर है। कारवां सराय के इस नए और आकर्षक स्वरूप से भविष्य में संभल में पर्यटन को बड़ा बढ़ावा मिलने की पूरी उम्मीद है। इससे स्थानीय निवासी अपनी अनमोल विरासत से तो परिचित होंगे ही, साथ ही रोजगार और विकास के नए साधन भी उत्पन्न होंगे। स्मारक की नियमित देखभाल के लिए विभाग द्वारा भविष्य में एक कर्मचारी (बहु-कार्य कर्मचारी/अनौपचारिक श्रमिक) की नियुक्ति की सुदृढ़ योजना भी है, ताकि इसकी सुंदरता और सुरक्षा हमेशा बनी रहे।*पांच अन्य ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण की भी तैयारी*कारवां सराय प्रवेश द्वार के शानदार कायाकल्प के बाद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने जिले की अन्य ऐतिहासिक संपदाओं को भी इसी तर्ज पर सहेजने का बेहतरीन खाका तैयार कर लिया है। आगामी कार्ययोजना के मुताबिक, सोंधन मुहम्मदपुर में ही कारवां सराय की मस्जिद और प्रवेश द्वार के शेष कार्य को पूरा किया जाएगा। इसके अलावा फिरोजपुर का पुराना किला और उसके अवशेष, चंदायन स्थित चंद्रेश्वर खेड़ा की चारदीवारी और गुमथल खेड़ा के प्राचीन टीले की चारदीवारी का भी योजनाबद्ध तरीके से संरक्षण किया जाएगा। प्रशासन और एएसआई का यह साझा और सकारात्मक प्रयास संभल को उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख ऐतिहासिक और पर्यटन केंद्र के रूप में उभारने में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

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