शांति भंग'(जो पहले CrPC की धारा 151, 107, 116 हुआ करती थीं) की धाराओं के दुरुपयोग पर हाईकोर्ट सख्त, अवैध हिरासत पर ₹25,000 प्रतिदिन मुआवजे का रास्ता साफ

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली में “शांति भंग” की धाराओं के कथित दुरुपयोग पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और किसी भी व्यक्ति को बिना वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए जेल नहीं भेजा जा सकता।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने हेबियस कॉर्पस रिट याचिका संख्या 317/2026, मंसूर अहमद उर्फ लल्लू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में 8 जून 2026 को सुनाए गए फैसले में 8 दिन तक अवैध हिरासत में रखे गए व्यक्ति को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि संबंधित दोषी अधिकारी, तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) के वेतन से वसूल की जाएगी।
क्या था मामला?
याचिकाकर्ता मंसूर अहमद का आरोप था कि 19 मार्च 2026 की रात करीब 12:50 बजे प्रयागराज के खीरी थाना क्षेत्र की पुलिस उसे उसके घर से उठाकर ले गई। पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 170, 126 एवं 135 (जो पहले CrPC की धारा 151, 107, 116 हुआ करती थीं) के तहत कार्रवाई का हवाला दिया।
बाद में उसे सहायक पुलिस आयुक्त एवं विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट, बारा के समक्ष प्रस्तुत किया गया। आरोप है कि मजिस्ट्रेट ने बिना पर्याप्त कानूनी प्रक्रिया अपनाए तथा बिना उचित सुनवाई का अवसर दिए एक मुद्रित प्रोफार्मा पर आदेश पारित कर सीधे जेल भेज दिया।
हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में कहीं भी यह उल्लेख नहीं था कि याचिकाकर्ता ने व्यक्तिगत बांड भरने से इनकार किया था। इसके बावजूद उसे 27 मार्च 2026 तक जेल में रखा गया।
हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी
खंडपीठ ने कहा कि पुलिस कमिश्नरों और उनके अधीन कार्य कर रहे अधिकारियों को जो मजिस्ट्रेटी शक्तियां प्रदान की गई हैं, उनका कई मामलों में “जमकर दुरुपयोग” किया जा रहा है।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों से यह तथ्य सामने आया कि गाजियाबाद और प्रयागराज समेत कई जिलों में BNSS की धारा 126, 135 और 170 के तहत हजारों नागरिकों को एक दिन से लेकर 20 दिनों तक जेलों में बंद रखा गया है।
कोर्ट ने इसे “बेहद चौंकाने वाली स्थिति” करार देते हुए कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार के साथ इस प्रकार का व्यवहार स्वीकार नहीं किया जा सकता।
पूरे उत्तर प्रदेश के लिए हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण निर्देश
राज्य सरकार द्वारा नई नीति बनाए जाने तक हाईकोर्ट ने पूरे प्रदेश में निम्नलिखित दिशा-निर्देश लागू कर दिए हैं:
- जमानती की आवश्यकता समाप्त
प्रिवेंटिव डिटेंशन अथवा शांति भंग की कार्रवाई में अब व्यक्ति से केवल व्यक्तिगत बांड (Personal Bond) लिया जाएगा। इसकी अधिकतम राशि ₹20,000 होगी।
किसी बाहरी जमानती (Surety) की मांग नहीं की जाएगी।
- बांड भरते ही तत्काल रिहाई
यदि व्यक्ति व्यक्तिगत बांड भर देता है तो उसे तत्काल रिहा करना होगा।
- इनकार का ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड जरूरी
यदि कोई व्यक्ति बांड भरने से इनकार करता है तो उसका इनकार लिखित रूप में दर्ज करने के साथ-साथ ऑडियो-विजुअल माध्यम से रिकॉर्ड करना अनिवार्य होगा।
- 24 घंटे से अधिक अवैध हिरासत पर मुआवजा
यदि किसी नागरिक को बिना वैध कानूनी आधार के 24 घंटे से अधिक हिरासत में रखा जाता है तो राज्य सरकार उसे ₹25,000 प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा देगी।
- दोषी अधिकारियों की सैलरी से होगी वसूली
मुआवजे की पूरी राशि संबंधित दोषी अधिकारी या मजिस्ट्रेट के वेतन से वसूल की जाएगी।
- विभागीय कार्रवाई भी होगी
दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शुरू की जाएगी।
पुलिस व्यवस्था में बड़ा बदलाव
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उत्तर प्रदेश में पुलिस एवं कार्यपालक मजिस्ट्रेटों द्वारा “शांति भंग” की धाराओं के प्रयोग के तरीके को पूरी तरह बदल सकता है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि अब केवल आशंका के आधार पर किसी नागरिक की स्वतंत्रता को लंबे समय तक प्रतिबंधित नहीं किया जा सकेगा।
हाईकोर्ट ने पुलिस कमिश्नर, प्रयागराज को 14 सितंबर 2026 तक आदेश के अनुपालन की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया है।
यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा और पुलिस जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर माना जा रहा है।
