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यूपी में बिजली का ‘प्रीपेड’ संकट: 70 लाख उपभोक्ताओं का फूटा गुस्सा, क्या हिल जाएगी सत्ता की कुर्सी?

ByMoradabadprahari

Apr 10, 2026

मुरादाबाद की जनता में भारी आक्रोश

(प्रतीतात्मकपोस्टर )

मुरादाबाद/लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजली मीटरों को ‘पोस्टपेड’ से ‘प्रीपेड’ में बदलने की प्रक्रिया ने अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन का रूप ले लिया है। प्रदेश के करीब 70 लाख विधुत उपभोक्ताओं को जबरन प्रीपेड व्यवस्था में धकेले जाने से जनता में भारी रोष व्याप्त है। मुरादाबाद सहित पूरे प्रदेश में इसे लेकर हंगामा खड़ा है, जिससे योगी सरकार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।

पीतल नगरी मुरादाबाद में प्रीपेड मीटरों के खिलाफ विरोध की लहर सबसे तेज है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि बिना उनकी सहमति और बिना किसी पूर्व सूचना के उनके कनेक्शनों को प्रीपेड में बदला जा रहा है। उपभोक्ताओं का आरोप है कि प्रीपेड सिस्टम में रिचार्ज खत्म होते ही बिना किसी चेतावनी के बिजली काट जाती है, जिससे बच्चों की पढ़ाई और घर के जरूरी काम प्रभावित हो रहे हैं।

ऊर्जा मंत्री की चुप्पी पर उठे सवाल हैरानी की बात यह है कि जहां पूरे प्रदेश में जनता सड़कों पर है, वहीं प्रदेश के ऊर्जा मंत्री की चुप्पी ने आग में घी डालने का काम किया है। विभाग की ओर से कोई स्पष्टीकरण न आने के कारण उपभोक्ताओं में यह संदेश जा रहा है कि सरकार संवेदनहीन बनी हुई है। जानकारों का मानना है कि बिना उपभोक्ताओं को विश्वास में लिए किया गया यह फैसला आने वाले चुनावों में सरकार के लिए भारी पड़ सकता है।

बैकफुट पर सरकार, नियामक आयोग की दखल संभव बढ़ते विरोध और जनता की परेशानी को देखते हुए अब शासन स्तर पर हलचल तेज हो गई है। सूत्रों की मानें तो सरकार इस मुद्दे पर ‘बैकफुट’ पर है और जल्द ही इस प्रक्रिया पर रोक लगाई जा सकती है या नियमों में ढील दी जा सकती है। इसी बीच, विद्युत नियामक आयोग ने भी मामले का संज्ञान लिया है। उम्मीद जताई जा रही है कि आयोग उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए कोई बड़ा फैसला सुना सकता है।

सहमति का अभाव: उपभोक्ताओं का दावा है कि उनकी मर्जी के बिना मीटर बदले गए।

तकनीकी खामियां: सर्वर डाउन होने पर रिचार्ज न होना और मनमाना बैलेंस कटना मुख्य समस्या।

सियासी हलचल: विपक्ष ने इस मुद्दे को लपक लिया है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ गया है।

संपादकीय टिप्पणी: क्या सरकार तकनीक के नाम पर आम आदमी की जेब और उसकी सुविधा से समझौता कर रही है? 70 लाख परिवारों की नाराजगी किसी भी सरकार के लिए खतरे की घंटी है। अब देखना यह है कि विद्युत नियामक आयोग इस “करंट” को कैसे शांत करता है।

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