राजनीति का अपराधीकरण पर लगाम लगानी होगी

नई दिल्ली, भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन इसके मंदिर यानी ‘संसद’ और ‘विधानसभाओं’ में बैठने वाले प्रतिनिधियों की पृष्ठभूमि अक्सर सवालों के घेरे में रहती है। ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) की विभिन्न रिपोर्टें यह स्पष्ट करती हैं कि राजनीति का अपराधीकरण एक कड़वी सच्चाई बन चुका है।
अपराधी छवि और न्यायिक प्रक्रिया अक्सर देखा गया है कि कई सांसद और विधायक ऐसे हैं जिन पर हत्या, अपहरण और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं। कई मामलों में निचली अदालतें (Lower Courts) उन्हें दोषी भी करार दे चुकी होती हैं, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया की लंबी अवधि और ऊपरी अदालतों में अपील के प्रावधानों का लाभ उठाकर वे पदों पर बने रहते हैं। यह स्थिति न केवल कानून के शासन को चुनौती देती है, बल्कि आम जनता का न्यायपालिका और व्यवस्था से भरोसा भी कम करती है।
शिक्षा और कार्यकुशलता का अभाव भारतीय संविधान में चुनाव लड़ने के लिए कोई न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता (Minimum Educational Qualification) निर्धारित नहीं है। इसके पीछे तर्क यह था कि शिक्षा का अभाव किसी को नेतृत्व के अधिकार से वंचित न करे। परंतु, आज के जटिल प्रशासनिक दौर में जहाँ नीति-निर्माण और कानून बनाने के लिए तकनीकी और सामाजिक समझ की आवश्यकता है, वहां कम पढ़े-लिखे या अपराधी छवि वाले नेताओं की मौजूदगी शासन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।
संपादकीय टिप्पणी ,जब तक राजनीतिक दल खुद ‘दागी’ उम्मीदवारों को टिकट देना बंद नहीं करेंगे और जनता ‘बाहुबल’ के बजाय ‘चरित्र और योग्यता’ को प्राथमिकता नहीं देगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। लोकतंत्र को गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए चुनावी सुधारों के साथ-साथ नागरिक जागरूकता भी अनिवार्य है।
