
प्रायागराज /गाजियाबाद, उच्च नयालय के एक ऐतिहासिक फैसले में, माननीय न्यायालय ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) द्वारा गाजियाबाद के तत्कालीन मुख्य पासपोर्ट अधिकारी, शैलेश कुमार यादव (IPS) के विरुद्ध पारित दंडात्मक आदेशों को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि RTI अधिनियम की धारा 20 के तहत दंड लगाने की शक्ति का प्रयोग निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत राय या पूर्वाग्रह के आधार पर।क्या था मामला? रिट पिटीशन संख्या 10430 /2009 में सूचना आयोग के आदेश को चुनौती दी गई थी यह विवाद सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20(1) के तहत लगाए गए जुर्माने और अनुशासनात्मक सिफारिशों से जुड़ा था। सूचना आयुक्त ओ.पी. केजरीवाल ने 8 फरवरी 2007 और 19 मार्च 2007 को आदेश जारी कर आईपीएस अधिकारी शैलेश कुमार यादव पर दंडात्मक कार्रवाई की थी। याचिकाकर्ता ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर कर इन आदेशों को चुनौती दी थी।
न्यायालय की कड़ी टिप्पणी: “पूर्वाग्रह से ग्रसित थे आदेश“मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि सूचना आयोग द्वारा प्रयुक्त भाषा वैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करती है। अदालत ने अपने फैसले में मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला कहा कि निष्पक्षता का अभाव है ,न्यायालय ने माना कि आयोग के आदेश तर्कसंगत निष्कर्षों के बजाय पूर्वाग्रह (Bias) और व्यक्तिगत असहमति से प्रभावित थे।प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन दंडात्मक कार्रवाई से पहले साक्ष्यों पर उचित विचार नहीं किया गया, जो प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है।
मनमाना रवैया: आदेशों को “अनुचित, मनमाना और कानून के विपरीत” करार देते हुए न्यायालय ने कहा कि धारा 20 का उद्देश्य दंड देना तब है जब कोई जानबूझकर बाधा डाले, न कि किसी पूर्व-निर्धारित राय के आधार पर अधिकारी को प्रताड़ित करना।RTI की धारा 20 की व्याख्याअदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 20 केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग को यह शक्ति देती है कि यदि कोई अधिकारी बिना किसी उचित कारण के सूचना देने में देरी करता है या गलत सूचना देता है, तो उस पर 250 रुपये प्रतिदिन (अधिकतम 25,000 रुपये) का जुर्माना लगाया जाए। हालांकि, यह शक्ति ‘न्यायिक विवेक’ पर आधारित होनी चाहिए, न कि ‘व्यक्तिगत पसंद’ पर।
“न्यायालय संतुष्ट है कि विवादित आदेश मुख्य पासपोर्ट अधिकारी की जांच रिपोर्ट और प्रतिवादी के पूर्वाग्रह को दर्शाते हैं। फलस्वरूप, दिनांक 08.02.2007 और 19.03.2007 के आदेशों को रद्द किया जाता है।” — अदालत का फैसला
इस फैसले का महत्व यह है , कि निर्णय लोक सूचना अधिकारियों (PIOs) के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है। यह सुनिश्चित करता है कि RTI के नाम पर अधिकारियों को बिना ठोस साक्ष्य और बिना निष्पक्ष सुनवाई के दंडित नहीं किया जा सकता। यह फैसला प्रशासनिक न्यायशास्त्र (Administrative Jurisprudence) में एक मिसाल बनेगा कि उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों को अपने निर्णयों में तटस्थता बनाए रखनी चाहिए।
