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ताने सुने, पर हार नहीं मानी: एनआरएलएम योजना से जुड़कर गोबर और जूट से अपनी किस्मत संवार रहीं ,शालिनी

ByMoradabadprahari

Mar 5, 2026

मात्र ₹2,500 के स्टार्टअप फंड से शुरुआत करने वाले ‘अंशिका स्वयं सहायता समूह’ का सालाना टर्नओवर आज लाखों में
खुद आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ 30 से अधिक महिलाओं को भी दिया रोजगार का मंत्र

मुरादाबाद, 5 मार्च : महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण की बात जब भी होती है, तो जमीनी स्तर पर संघर्ष कर रही महिलाओं की कहानियां सबसे ज्यादा प्रेरित करती हैं। मुरादाबाद जिले की ठाकुरद्वारा तहसील के रतुपुरा गांव की रहने वाली शालिनी आज ग्रामीण महिलाओं के लिए एक ऐसी ही शानदार मिसाल बन गई हैं। कभी जिन लोगों ने गोबर से उत्पाद बनाने पर उनका मजाक उड़ाया था, आज वही उनकी सफलता की तारीफ कर रहे हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) की मदद से शालिनी न सिर्फ खुद को आर्थिक रूप से सशक्त कर चुकी हैं, बल्कि दर्जनों अन्य महिलाओं को भी रोजगार से जोड़ रही हैं।

एनआरएलएम का साथ और ‘अंशिका समूह’ की शुरुआत
शालिनी का आत्मनिर्भरता का सफर साल 2021 में शुरू हुआ, जब वह एनआरएलएम योजना के तहत आईं आईसीआरपी (ICRP) टीम के संपर्क में आईं। उन्होंने 10 महिलाओं को साथ मिलाकर ‘अंशिका स्वयं सहायता समूह’ का गठन किया। योजना के तहत उनके समूह को शुरुआत में ₹2,500 का स्टार्टअप फंड और ₹15,000 का रिवॉल्विंग फंड (RF) मिला। जनवरी 2022 में उन्हें ₹1,10,000 का कम्युनिटी इन्वेस्टमेंट फंड (CIF) प्राप्त हुआ, जो अब बढ़कर ₹1,50,000 हो चुका है।
बैंक लिंकेज के माध्यम से ₹50,000 से शुरू हुई उनकी कैश क्रेडिट लिमिट (CCL) आज ₹2,00,000 तक पहुंच गई है, जिस पर मात्र 7% का ब्याज लगता है। इसी पूंजी से उन्होंने अपने छोटे से व्यवसाय की मजबूत नींव रखी।

जूट और गोबर (गोमय) से तराशा अपना रास्ता
शालिनी मुख्य रूप से पर्यावरण के अनुकूल जूट और गोमय (गोबर) उत्पाद बनाती हैं। नाबार्ड द्वारा गांव में ही दी गई 15 दिवसीय ट्रेनिंग के बाद उन्होंने जूट के लंच बैग, बोतल बैग, शॉपिंग बैग और हैंडी बैग बनाना शुरू किया। इसके अलावा, उन्होंने काशीपुर से निजी ट्रेनिंग लेकर गोमय उत्पादों का निर्माण भी शुरू किया।
उनके गोमय उत्पादों में समरानी कप, दीये, गोबर से बनी घड़ियां, मोमेंटो और नेमप्लेट शामिल हैं। आरसेटी (RSETI) के माध्यम से उन्होंने आर्टिफिशियल ज्वेलरी और अगरबत्ती बनाने का भी प्रशिक्षण लिया है।

आय में जबरदस्त उछाल और बाजार की पहुंच
सरकारी मेलों और प्रदर्शनियों ने शालिनी के उत्पादों को एक बड़ा बाजार दिया है। मुरादाबाद के सरस मेले व उदीषा 2026 महोत्सव जैसे आयोजनों में उनके स्टॉल लगते हैं। इसके अलावा, विकास भवन की बैठकों के लिए जूट के फाइल फोल्डर भी उनके समूह द्वारा सप्लाई किए जाते हैं। आज शालिनी जूट उत्पादों से महीने के ₹8,000 से ₹15,000 और गोमय उत्पादों से ₹7,000 से ₹10,000 तक कमा रही हैं। दिवाली जैसे त्योहारी सीजन में उनकी कमाई ₹25,000 से ₹26,000 तक पहुंच जाती है, जिससे उनकी सालाना आय में लगभग ₹1.5 लाख का इजाफा हुआ है।

जब ताना मारने वाले भी हुए मुरीद
सफलता की राह कभी आसान नहीं होती। शालिनी बताती हैं कि जब उन्होंने गोबर से उत्पाद बनाने का काम शुरू किया था, तो गांव के लोगों ने खूब मजाक बनाया और ताने मारे कि “गोबर से क्या होगा?”। लेकिन पति के अटूट समर्थन और अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से उन्होंने सबको गलत साबित कर दिया। आज उनके गांव रतुपुरा में कई स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं। शालिनी खुद 30 से अधिक महिलाओं को ट्रेनिंग दे चुकी हैं और गांव की कई अन्य महिलाएं उनसे काम सीखकर आत्मनिर्भर बन रही हैं।
शालिनी की यह कहानी इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि यदि सरकारी योजनाओं (एनआरएलएम) का सही दिशा में लाभ उठाया जाए, तो महिलाएं न सिर्फ अपनी, बल्कि पूरे समाज की तस्वीर बदल सकती हैं।

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