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Moradabad Prahari

News Paper

‘वर्दी’ का रसूख या गुंडागर्दी? CFO कृष्णकांत ओझा पर लगे संगीन आरोप!

ByMoradabadprahari

Jan 22, 2026

मुरादाबाद/संभल।

22 महीने का ‘फ्री स्टे’ 3 स्टार लग्जरी लाईफ और खौफ का साया

दीपावली पर ‘लग्जरी मीटिंग्स’ और उद्योगपतियों पर दबाव ,और अधिकारीयो को तोहफे

आज भी किसी न किसी बहाने आते रहते है सम्भल से मुरादाबाद

कहते हैं खाकी जनता की सुरक्षा के लिए होती है, लेकिन जब खाकी का इस्तेमाल मुफ्तखोरी और उगाही के लिए होने लगे, तो सिस्टम पर सवाल उठना लाजिमी है। मुरादाबाद और संभल के बीच इन दिनों चीफ फायर ऑफिसर (CFO) कृष्णकांत ओझा की कार्यप्रणाली को लेकर जबरदस्त चर्चा है। मामला सिर्फ पद के दुरुपयोग का नहीं, बल्कि एक होटल मालिक के मानसिक और आर्थिक शोषण का भी है। सूत्रो के अनुसार 2023 मे मुरादाबाद के ड्राईव इन 24 होटल के रूम नम्बर 210 मे
22 महीने का ‘फ्री स्टे’ किया, 3 स्टार लग्जरी लाईफ के मजे लिय और होटल संचालक पर खौफ का साया मंडराता रहा ,प्रप्त सूत्रो के अनुसार
, CFO कृष्णकांत ओझा पिछले 22 महीनों से एक 3 स्टार होटल में जमे हुए थे। हैरान करने वाली बात यह है कि इस लंबी अवधि के दौरान उन्होंने होटल को फूटी कौड़ी भी अदा नहीं की। आरोप है कि वर्दी के रौब और विभाग की पावर का डर दिखाकर उन्होंने होटल मालिक को इस कदर सहमा दिया कि वह चुपचाप उनकी हर फरमाइश पूरी करता रहा।
दीपावली पर ‘लग्जरी मीटिंग्स’ भी की गई और उद्योगपतियों पर दबाव बनाया गया , और अधिकारीयो को तौहफे दिये गये
CFO साहब का ‘कमाल’ यहीं नहीं रुका। सूत्रों का दावा है कि दीपावली के त्यौहार को उन्होंने कमाई के अवसर में बदल दिया ,होटल के लग्जरी माहौल का उपयोग शहर के बड़े उद्योगपतियों को बुलाने के लिए किया गया।

“किसी से मिठाई, तो किसी से मूर्ति”—आरोप है कि पद का भय दिखाकर भारी मात्रा में उपहारों और अन्य लाभों की वसूली की गई।
संभल से मुरादाबाद तक दबदबा बना कर रोज आना जाना लगा रहा रसूख का आलम यह था कि संभल से लेकर मुरादाबाद तक उनकी ‘वर्दी का खौफ’ चर्चा का विषय बना,
होटल मालिक की चुप्पी और सिस्टम की लाचारी ने इस पूरे मामले पर पर्दा डाले रखा
जिस होटल में यह पूरा खेल चल रहा था, उसका मालिक डर के मारे कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं था। विभाग द्वारा होटल की एनओसी (NOC) या अन्य तकनीकी कमियों का डर दिखाकर उसे मानसिक रूप से बंधक बना लिया गया था।
बड़ा सवाल: क्या एक जिम्मेदार पद पर बैठा अधिकारी इतने महीनों तक मुफ्त की सुख-सुविधाएं भोग सकता है? क्या शासन-प्रशासन की नाक के नीचे चल रहे इस ‘खेल’ की जानकारी उच्चाधिकारियों को नहीं थी?
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अब देखना यह होगा कि क्या इस “लग्जरी वसूली” के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होती है या रसूखदार अधिकारी अपने संपर्कों के दम पर इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डलवा देंगे।

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