
मुरादाबाद विकास प्राधिकरण (MDA) में प्रशासनिक पारदर्शिता और चयन प्रक्रियाओं को लेकर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। प्राधिकरण द्वारा सेवानिवृत्ति के महज कुछ ही दिनों के भीतर अधिशासी अभियंता से लेकर सहायक और अवर अभियंताओं तक को आउटसोर्सिंग एवं संविदा के माध्यम से दोबारा उन्हीं कुर्सियों पर वापस बैठाए जाने की तैयारी का मामला सामने आया है।
शासन के स्पष्ट नियमों और पारदर्शिता के दावों के बीच इस तरह की बैकडोर एंट्री ने स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अमले में हलचल मचा दी है।
नियमों की अनदेखी और ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ पर चर्चासरकारी विभागों में भ्रष्टाचार और हितों के टकराव (Conflict of Interest) को रोकने के लिए प्रशासनिक सेवा नियमों के तहत ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ का प्रावधान है।
इसके मुताबिक किसी भी राजपत्रित अधिकारी या इंजीनियर के सेवानिवृत्त होने के बाद 2 साल तक उसी विभाग या प्राधिकरण में सीधे या किसी आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से पुनः कार्य करने पर प्रतिबंध होता है।
इसके बावजूद मुरादाबाद विकास प्राधिकरण में रिटायरमेंट के तुरंत बाद पुराने चेहरों को वापस काम पर रखने से इन नियमों के पालन पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
MDA से पूछे जा रहे सीधे और तीखे सवालचयन प्रक्रिया और विज्ञापन: सेवानिवृत्त अधिकारियों को किस नियम और व्यवस्था के तहत दोबारा
रखा गया है और क्या इसके लिए कोई खुला विज्ञापन जारी किया गया था?शासन की अनुमति: क्या इन नियुक्तियों के लिए शासन या किसी सक्षम स्तर से लिखित अनुमति ली गई है?
यदि हाँ, तो इसके आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे हैं?UPCOS और GeM के प्रावधान: क्या इन नियुक्तियों में उत्तर प्रदेश सरकार की आउटसोर्सिंग व्यवस्था और नए नियमों का पूरी तरह पालन किया गया है?
मानदेय और वित्तीय आधार: इन अधिकारियों को मिलने वाले मानदेय और भुगतान का आधार क्या है, और यह किस वित्तीय स्रोत से दिया जा रहा है?इस पूरे घटनाक्रम ने मुरादाबाद विकास प्राधिकरण की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि इस मामले में प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारी और शासन स्तर से क्या सफाई सामने आती है और दस्तावेजों को सार्वजनिक कर स्थिति कितनी स्पष्ट की जाती है।
