| भागलपुर के पीरपैंती में 2,400 MW पावर प्लांट के लिए अडानी पावर को ₹1/वर्ष की लीज पर मिली 1050 एकड़ जमीन। |

बिहार , भागलपुर (बिहार)बिहार के भागलपुर जिले का पीरपैंती इलाका इन दिनों देश के सियासी और आर्थिक गलियारों में चर्चा के केंद्र में है।
वजह है राज्य का सबसे बड़ा प्रस्तावित थर्मल पावर प्रोजेक्ट और उससे जुड़ी 1050 एकड़ ज़मीन।सरकार का दावा है कि ₹21,000 करोड़ के भारी-भरकम निजी निवेश से बिहार बिजली के मामले में सरप्लस राज्य बनेगा और युवाओं को रोजगार मिलेगा। वहीं दूसरी ओर, विपक्ष इसे “सरकारी खजाने और जनता की जमीन का सौदा” बताकर सड़क से संसद तक घेराबंदी कर रहा है।आखिर क्या है ₹1 की लीज का पूरा गणित? क्या वाकई बिहार को इससे कोई बड़ा फायदा होने वाला है, या यह महज एक कॉरपोरेट डील है?
आइए समझते हैं इस पूरे घटनाक्रम की एक-एक परत।
1. पृष्ठभूमि: पीरपैंती का वो सपना, जो वर्षों से अधूरा था भागलपुर का पीरपैंती क्षेत्र दशकों से एक बड़े पावर प्लांट का इंतजार कर रहा था। शुरुआत में इसे राष्ट्रीय तापविद्युत निगम (NTPC) और राज्य सरकार के संयुक्त उपक्रम के रूप में विकसित करने की योजना थी, लेकिन कोयला आवंटन (Coal Linkage) और जमीन अधिग्रहण की जटिलताओं के कारण परियोजना वर्षों तक ठंडे बस्ते में पड़ी रही।बिहार में बढ़ती बिजली की मांग और औद्योगिक विकास की आवश्यकता को देखते हुए राज्य सरकार ने इस प्रोजेक्ट को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल पर आगे बढ़ाने का फैसला किया। इसके तहत 2,400 मेगावाट (MW) क्षमता का विशाल तापीय विद्युत संयंत्र लगाने की रूपरेखा तैयार हुई।
2. डील का केंद्र बिंदु: 1 रुपए सालाना लीज और अडानी ग्रुप की एंट्रीपरियोजना के लिए वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बोलियाँ (Competitive Bidding) आमंत्रित की गईं। इस टेंडर प्रक्रिया में JSW Energy, टॉरेंट पावर जैसी देश की दिग्गज कंपनियों ने हिस्सा लिया। बाजी मारी अडानी पावर लिमिटेड (Adani Power Limited) ने।
डील की मुख्य शर्तें:
टोकन लीज रेंट: अडानी पावर को यह 1050 एकड़ जमीन 33 वर्षों के लिए मात्र ₹1 प्रति वर्ष के सांकेतिक किराए पर दी गई।
बिल्ड, ओन्ड एंड ऑपरेट (BOO): कंपनी खुद पूरा पूंजीगत खर्च (₹21,000+ करोड़) उठाएगी।
सस्ती बिजली की गारंटी: अडानी ग्रुप का चयन इसलिए हुआ क्योंकि उसने बिहार को सबसे कम दर पर बिजली उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखा।
3. विवाद का धमाका: विपक्ष का सीधा हमला जैसे ही ₹1 लीज दर की खबर सार्वजनिक हुई, बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया। विपक्षी दलों (विशेषकर कांग्रेस) ने मोर्चा खोलते हुए कई गंभीर सवाल खड़े किए।
“कौड़ियों के भाव जमीन”: विपक्ष का आरोप है कि भागलपुर की उपजाऊ और कीमती 1050 एकड़ जमीन निजी पूंजीपति को मुफ़्त के भाव सौंप दी गई।
पर्यावरण को नुकसान: दावे किए गए कि प्रोजेक्ट की जद में आने वाले लाखों फलदार, आम, कटहल और सागौन के पेड़ों को काटा जाएगा, जिससे इलाके का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाएगा।
सार्वजनिक संपत्ति का दोहन: विपक्षी प्रवक्ताओं ने इसे ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ का उदाहरण बताते हुए आरोप लगाया कि जनता के पैसे से अधिग्रहित जमीन निजी मुनाफे के लिए दी जा रही है।
4. सरकार और विशेषज्ञों की दलील: ‘गिफ्ट नहीं, यह स्टैंडर्ड PPP मॉडल है’विपक्ष के तीखे हमलों के बीच बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी (BSPGCL) और राज्य सरकार ने स्थिति साफ की।
अधिकारियों और आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार:
स्वामित्व ट्रांसफर नहीं हुआ: जमीन बेची नहीं गई है; इसका मालिकाना हक बिहार सरकार के पास ही सुरक्षित रहेगा। 33 साल बाद यह संपत्ति पुनः सरकार के अधीन होगी।
निवेश आकर्षित करने की रणनीति: जब किसी राज्य में 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का निजी निवेश लाना होता है, तो इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के तहत राज्य सरकारें जमीन का सांकेतिक किराया (Token Rent) ही लेती हैं। इसे औद्योगिक प्रोत्साहन नीति कहा जाता है।
बिहार का वित्तीय फायदा: अगर सरकार खुद यह पावर प्लांट बनाती, तो ₹21,000 करोड़ का सीधा बोझ राज्य के बजट पर पड़ता। PPP मॉडल से यह पूरा वित्तीय जोखिम निजी कंपनी का है, जबकि बिहार को सस्ती बिजली मिलेगी।
5. जमीनी हकीकत: जनता और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए क्या मायने हैं? राजनीतिक नफा-नुकसान से परे, अगर स्थानीय परिप्रेक्ष्य से देखें तो पीरपैंती के लिए यह प्रोजेक्ट दोधारी तलवार जैसा है।
रोजगार की उम्मीद: निर्माण कार्य शुरू होने से लेकर प्लांट चालू होने तक हजारों कुशल-अकुशल मजदूरों, इंजीनियरों और ट्रांसपोर्टरों के लिए आजीविका के नए दरवाजे खुलेंगे।
स्थानीय बाजार को गति: इतने बड़े प्लांट के आने से पीरपैंती और आसपास के इलाकों में रियल एस्टेट, लॉजिस्टिक्स, होटल व सर्विस सेक्टर को भारी बढ़ावा मिलेगा।
विस्थापन और मुआवजा: स्थानीय स्तर पर मुख्य चिंता उन किसानों और भूमि स्वामियों की है जिनकी जमीनें इसमें शामिल हैं। उनके पुनर्वास और उचित मुआवजे का पारदर्शी क्रियान्वयन ही इस विवाद को हमेशा के लिए शांत कर सकता है।
संपादकीय निष्कर्ष: संतुलन की कसौटी पर बिहार का औद्योगिक भविष्य भागलपुर का पीरपैंती पावर प्लांट केवल एक बिजली परियोजना नहीं है, बल्कि यह इस बात की परीक्षा भी है कि बिहार किस तरह अपने औद्योगिक पिछड़ेपन को दूर करता है।₹1 लीज रेंट को लेकर खड़ा हुआ विवाद राजनीतिक रूप से भले ही गर्म रहे, लेकिन आर्थिक नियमों के अनुसार पारदर्शी बोली से आया निजी निवेश राज्य के लिए वरदान साबित हो सकता है—शर्त बस इतनी है कि सरकार पर्यावरण सुरक्षा, निष्पक्ष मुआवजा और सस्ती बिजली के वादों पर खरी उतरे ।
