
बिजनौर ,दो-तीन दिन पहले धामपुर शहर में एक गाय कूड़े के ढेर में भोजन तलाशने को मजबूर थी। उसके पैर में गंभीर चोट थी। शरीर कमजोर था और हालात बेहद दयनीय थे। यह दृश्य केवल एक पशु की पीड़ा नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक संवेदनहीनता का आईना था।इस खबर को सांध्य दैनिक चिंगारी और सांध्य दैनिक प्रयाण ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। इसके बाद संबंधित लोगों ने संज्ञान लिया और घायल गौवंश को अस्थायी रूप से गौरी गौशाला आश्रम भेजा गया।वहाँ आचार्य डॉ. दिनेश चंद्र भारद्वाज और गौसेवक गौतम गिरी ने पूरी निष्ठा और सेवा भाव से उसका उपचार कराया। उन्होंने हर संभव प्रयास किया। लेकिन उसकी हालत इतनी गंभीर थी कि आज सुबह उसने अंतिम सांस ले ली।उसकी मृत्यु केवल एक गौवंश की मृत्यु नहीं है,बल्कि यह हम सभी के लिए एक मौन प्रश्न है।कब तक धामपुर की सड़कें घायल और बेसहारा गौवंशों की अंतिम शरण बनी रहेंगी?कब तक वे कूड़े के ढेर में भोजन तलाशते रहेंगे?क्या धामपुर नगर क्षेत्र में एक स्थायी,व्यवस्थित और पर्याप्त क्षमता वाली गौशाला का निर्माण कभी होगा। या हर बार किसी गौवंश की मौत के बाद केवल अफसोस ही व्यक्त किया जाएगा?यदि हम वास्तव में गौसेवा की बात करते हैं, तो अब समय केवल भावनाएँ व्यक्त करने का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का है। जनप्रतिनिधियों, प्रशासन, समाजसेवियों,धार्मिक संस्थाओं, उद्योगपतियों और नगरवासियों, सभी को मिलकर इस दिशा में गंभीर पहल करनी होगी।
आइए, इस मासूम गौवंश की मृत्यु को व्यर्थ न जाने दें। यही उसके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि भविष्य में कोई भी गौवंश भूख, चोट और लावारिस हालात में दम न तोड़े।धामपुर में स्थायी गौशाला निर्माण की मांग को आवाज़ दें। एक शेयर,एक सुझाव और एक प्रयास भी बदलाव की शुरुआत बन सकता है।
