
नई दिल्ली: भारतीय अदालतों में लंबित करोड़ों मुकदमों के बोझ और निर्दोष लोगों को कानूनी शिकंजे में फंसाने की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है। भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह में जवाब तलब किया है।
याचिका का मुख्य उद्देश्य: “सत्यमेव जयते” की सार्थकता अश्विनी उपाध्याय की इस याचिका का मूल उद्देश्य न्याय प्रणाली के दुरुपयोग को रोकना है। याचिका में तर्क दिया गया है कि झूठी शिकायतों और फर्जी हलफनामों के कारण न केवल निर्दोषों का जीवन बर्बाद होता है, बल्कि अदालत का कीमती समय भी नष्ट होता है।प्रमुख माँगें और प्रस्तावित प्रावधानइस याचिका में न्याय व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए निम्नलिखित कठोर कदमों की मांग की गई है
5 साल की जेल और भारी जुर्माना: याचिका में मांग की गई है कि जो व्यक्ति जानबूझकर झूठी FIR दर्ज कराता है, फर्जी गवाही देता है या अदालतों में झूठे सबूत पेश करता है, उसे कम से कम 5 साल की कैद और भारी आर्थिक दंड मिलना चाहिए।
सार्वजनिक स्थानों पर ‘चेतावनी बोर्ड’:
कानून का डर पैदा करने के लिए सभी पुलिस थानों, तहसीलों, जिला न्यायालयों और महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालयों के बाहर बड़े डिस्प्ले बोर्ड लगाए जाएं। इन बोर्डों पर स्पष्ट रूप से लिखा हो कि “झूठी शिकायत या शपथ पत्र देना दंडनीय अपराध है और इसके लिए जेल हो सकती है।
“भारतीय न्याय संहिता (BNS) का प्रभावी क्रियान्वयन: याचिका में अपील की गई है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र को निर्देश दे कि वह BNS/BNSS के तहत फर्जीवाड़े के खिलाफ सख्त दिशा-निर्देश (Guidelines) तैयार करे।क्यों जरूरी है यह कदम?अदालतों में अक्सर देखा जाता है कि आपसी रंजिश निकालने के लिए लोग कानून का सहारा लेते हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, जब तक झूठी शिकायत करने वालों के मन में सजा का खौफ नहीं होगा, तब तक फर्जी मुकदमों की बाढ़ को नहीं रोका जा सकता। वर्तमान में भारतीय दंड संहिता की धाराओं (जैसे धारा 182 या 211 IPC, अब नए कानूनों में समाहित) के तहत प्रक्रिया इतनी जटिल है कि झूठी शिकायत करने वाले आसानी से बच निकलते हैं।
।”न्याय का पहिया तब तेजी से घूमेगा जब फर्जी मुकदमों की भीड़ छंटेगी। निर्दोष को सजा से बचाना जितना जरूरी है, झूठा आरोप लगाने वाले को सजा देना उतना ही अनिवार्य है।”
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस पर अपनी राय रखने को कहा है। 4 सप्ताह बाद होने वाली अगली सुनवाई में यह तय हो सकता है कि क्या अदालत इस संबंध में कोई स्थायी गाइडलाइन जारी करेगी या सरकार को नया कानून बनाने का निर्देश देगी।
